अबकी सर्दी अच्छी है।
पर जगना पड़ता है।।
मन ना भी हो।
पर लगना पड़ता है।।
साँस रुकने को कहती है।
पर जीने के लिए कुछ करना पड़ता है।।
अच्छा !
अबकी सर्दी में कुछ खास होगा।
अकेले कब से थे, पर अब एहसास होगा।।
ये बदनसीबी का सिलसिला अच्छा।
लगी आग तो घर जला अच्छा।।
अबकी सर्दी, गद्दा कहीं, और रजाई कहीं और।
दिया कहीं, और दिया सलाई कहीं और।।
जब जीना दुसवार! तो क्या मंदिर क्या मदीना अच्छा।
ऐसी हो सर्दी तो।
फिर चिल-चिलाता पसीना अच्छा है।
रोहित "सादिक"