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Sunday, 25 November 2018

मुझे दासता सुनाने दो...

मुझे दासता सुनाने दो।
कुछ नए रास्ते बनाने दो।
मेरी फ़ितरतो को मत देखो।
नए आसमां बनाने दो।

मैं अब वो नही हूँ, जो था कभी।
मैं हुआ हूँ ऐसा, अब, अभी अभी।
मेरी ज़िंदगी में आओ, फिर देखो।
साथ चलो, बस कारवाँ बनाने दो।।

रोहित "सादिक़"

Monday, 23 July 2018

न कुछ कहा न सुना उसने...

न कुछ कहा न सुना उसने।
लाखो में एक मुझे चुना जिसने।
ये किसकी नजर लगी रब जाने।
बीच रास्ते मे छोड़ा मुझे।
कसमे खाई थी सात जन्मों कि जिसने।

किसपे ऐतबार करू, इतराऊ किसपे।
एक जान वो भी छोटी सी।
किसे किसे चाहूँ, लूट जाऊं किस पे।

उस सितमगर की भेंट चड़ के भी तो सुकूँ नही आया।
मारा छुरी भी उसी ने।
जान कहके कभी बुलाया था जिसने।

न कुछ कहा न सुना उसने।

रोहित "सादिक़"

Wednesday, 27 June 2018

मैं साँवन भादौ सा बरस जाऊँगा

मैं साँवन भादौं सा बरस जाऊँगा।
दो बूँद ही छलका जो तर भीतर तक कर जाऊँगा।

ये जो तपिश तेरे खयालो में है मेरी ख़ातिर।
मैं बादल हु बस मोती सा बिखर जाऊँगा।

कब ओश की बूंदें प्यास मिटाती हैं।
बस प्यास और ज्यादा बढ़ाती है।

Saturday, 16 June 2018

इश्क़ में बेवफ़ा से हमदर्दी जरूरी है।

अब तो बेवफ़ा होना भी आम है।
ये कौन सा कोई मुश्किल काम है।

इश्क़ में बेवफ़ा से हमदर्दी जरूरी है।
वफ़ा की क़दर के लिए।
बेकदरी जरूरी है।

रोहित सादिक़

Tuesday, 12 June 2018

उनके हुजरे में गये की रूसवाई मिटा लें।

उनके हुजरे में गये कि रुसवाई मिटा लें।
दो घूट लें और सारी तनहाई मिटा लें।
वो एड़ियां रगड़ रहीं हैं कि बस, कोई हीरा उन्हें मिल जाये।
ये नहीं कि, ये, कोहिनूर गले लगा लें।

रोहित "सादिक़"

Friday, 1 June 2018

My words forever

बात ये है की लोग हमारी महफ़िलो को तरसें।
और वो है की हम पे ही बरसें।

Rohit "Sadik"

Saturday, 12 May 2018

My words forever

जो व्यक्ति, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होगा वह समाज कल्याण की बात नहीं कर सक्ता।
इसलिए समाज को भी उसकी उतनी ही परवाह करनी चाहिए, जितनी प्रकाश के लिए जलते दीपक से निकलने वाले धुएँ की परवाह की जाती है।

The person who will be motivated by personal self-interest, does not talk about social welfare.
Therefore, society should also care for it's equally, as much as the smoke that is emitted from the burning lamp for the light is cared for.

रोहित "सादिक़ "

Friday, 27 April 2018

अब प्यार करने को मैं न रह पाउँगा...

अब प्यार करने को मैं न रह पाउँगा...
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मेरे जाने का गम, न आने की ख़ुशी होगी।
मेरे बाद, न जिंदगी होगी।
तू आस्तीन में रखती है, न जाने क्या क्या।
मैं यूं मुकर जाऊंगा, सोचती होगी।

मैं कुछ कहूँ भी न, चुप रहूँ भी न।
पास पास मगर साथ रहूँ भी न।
तू खुद से पूछ के तेरी आँखों में अब भी पानी है?
मैं कैसे कहूँ के सांस लूँ मगर जी पाऊँ भी न।

मेरे मजबूर क़दम अब ठहर से गए।
तुझे देख यूँ, ये सहम से गए।
मैं देखूँ कभी उसे, कभी तुझे।
चोट लगी और हम दहल गए।

तेरा मिजाज तुझे मुबारक हो।
ये साज बाज तुझे मुबारक हो।
मैं ख़ुश हूँ की, तू खुश हो।
और गम है, की खुश क्यूँ हो।

तेरी चाल मैं न चल पाउँगा।
मामला दिल का है खुल के न कह पाउँगा।
तुझे अब जरुरत है, की संभल जाये।
माफ़ करने को हर बार मैं न रह पाउँगा।
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अब प्यार करने को मैं न रह पाउँगा।।

रोहित "सादिक़"

Saturday, 21 April 2018

तू दरिया ए इश्क़...

तू दरिया ए इश्क़
उतर जाउ कैसे
बिना ड़ूबे बिना
बच पाऊँ कैसे
दवा, दुआ न काम आई
शराब मरहम सी, जरा आराम लाई
मै बुतों की नुमाइंदगी कुरू
किस किस की क्यूँ बंदगी करू
तू दरिया ए इश्क़
मेरी नुमाइश दर ब दर
बस एक ख्वाहिश इस क़दर
तेरा रंग लूँ
तेरा राग लूँ
तू रुक यहाँ
मैं तराश लूँ
तू दरिया के इश्क़
शतर पाउ कैसे
मासूदगी(संतोष) तेरी फिर
मुस्तआर(उधारी) क्यूँ
मक़सूद तू, तो
मिजाज क्यूँ
तू दरिया ए इश्क़
रोहित सादिक़

Thursday, 5 April 2018

तेरी आदत सुधर जाये तो ग़नीमत है...

तेरी आदत सुधर जाये तो ग़नीमत है।
मेरी बात समझ आये तो ग़नीमत है।
जो रंग चढ़ा है तुझपे, वो सजा, न किसी पे।
तेरा भी जल्द उतर जाये तो ग़नीमत है।

रोहित सादिक़

My words forever

मैं फ़िजूल की कवायत में वक़्त जाया नहीं करता।
हाँथी की सवारी करता हूँ, कुत्तों के भौकने में आया नही करता।

रोहित सादिक़

Friday, 16 February 2018

MY WORDS ROREVER

न कोई हमदर्दी न दिलाशा। 
ये कैसा है रिस्ता ये कैसी है आशा। 

हमें किस तरह से है जुस्तज़ू तुम्हारी। 
तुम  मिले न कहीं हमने हर जगह तलाशा। 

हर रोज खटखटाते रहे तेरी चौखट। 
फिर भी न खुला तेरा दरो-दरवाज़ा। 

न कोई हमदर्दी न दिलाशा। 
ये कैसा है रिस्ता ये कैसी है आशा। 

रोहित "सादिक़"

MY WORDS FOREVER

तुझे अपनी गलती का एहसास होगा। 
भरोसा है तुझे भी प्यार होगा। 

एड़िया रगड़ रहा हूँ जो तेरे दरो-दीवार के। 
यकीं है तुझे भी इंतजार होगा। 

ये गुलिस्ताँ-ए-हुस्न कब मुकम्मल साथ देता है।
ख़बर रख, काटों से काम होगा। 

तुझे अपनी गलती का एहसास होगा।

रोहित "सादिक़ "

MY WORDS FOREVER


वो मर गया,
वहम ज़िंदा है अब भी। 

रीता मैं। 
मन परिंदा है अब भी। 

कोशिश-ए-नाकाम की, कि जला दूँ उसे। 
दिल -ए -दरबार में एक पुलिंदा है अब भी। 

रोहित "सादिक"

Wednesday, 3 January 2018

बाल कविता

चित्र विचित्र बना घनघोर।
चले है बढ़ते तम की ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

बादल बदले।
नदियाँ बदली।
थल-नभ बदले चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

उजड़े वन, उपवन सब उजड़े।
कूप तड़ाग सरोवर छिछले।

कमतर पगडण्डी सब उजड़ी।
और गाँव की गालियाँ उजड़ीं।
खपरैले की चौपालें भी।
घासों की झोपड़ियाँ उजड़ीं।

तिनके बिखरे चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

चमकीली तितली की लड़ियाँ।
मोर चकोर सुहावन चिड़ियाँ।
अब न रहीं बौरें रसबोर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

कौतूहल हो रहा प्रकृति में।
असमंजस में दुनियाँ सारी।
कर दोहन धरनी का निसदिन।
सींच रहे अपनी फुलवारी।


कर विकाश, विनाश का प्रतिदिन।
हो प्रसन्न गुणगान कर रहे।
कोप प्रकृति बरसाये जिसदिन।
मिलकर सब क्यूँ विलाप कर रहे।

आओ हम सब फूल खिलाये।
धरनी का श्रृंगार सजायें।
वापस लें आये नदियों को।
जहाँ विहग सब सोर मचाये।

स्वस्थ धरा हो वायु सुगन्धित।
स्वस्थ समाज रहे हरओर।

कलयुग की चाभी जो पकड़ी।
खुलेंगे कालमुख चारोओर।

रोहित "सादिक़ "

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