चित्र विचित्र बना घनघोर।
चले है बढ़ते तम की ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
बादल बदले।
नदियाँ बदली।
थल-नभ बदले चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
उजड़े वन, उपवन सब उजड़े।
कूप तड़ाग सरोवर छिछले।
कमतर पगडण्डी सब उजड़ी।
और गाँव की गालियाँ उजड़ीं।
खपरैले की चौपालें भी।
घासों की झोपड़ियाँ उजड़ीं।
तिनके बिखरे चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
चमकीली तितली की लड़ियाँ।
मोर चकोर सुहावन चिड़ियाँ।
अब न रहीं बौरें रसबोर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
रोहित "सादिक़ "
चले है बढ़ते तम की ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
बादल बदले।
नदियाँ बदली।
थल-नभ बदले चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
उजड़े वन, उपवन सब उजड़े।
कूप तड़ाग सरोवर छिछले।
कमतर पगडण्डी सब उजड़ी।
और गाँव की गालियाँ उजड़ीं।
खपरैले की चौपालें भी।
घासों की झोपड़ियाँ उजड़ीं।
तिनके बिखरे चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
चमकीली तितली की लड़ियाँ।
मोर चकोर सुहावन चिड़ियाँ।
अब न रहीं बौरें रसबोर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।
कौतूहल हो रहा प्रकृति में।
असमंजस में दुनियाँ सारी।
कर दोहन धरनी का निसदिन।
सींच रहे अपनी फुलवारी।
कर विकाश, विनाश का प्रतिदिन।
हो प्रसन्न गुणगान कर रहे।
कोप प्रकृति बरसाये जिसदिन।
मिलकर सब क्यूँ विलाप कर रहे।
आओ हम सब फूल खिलाये।
धरनी का श्रृंगार सजायें।
वापस लें आये नदियों को।
जहाँ विहग सब सोर मचाये।
स्वस्थ धरा हो वायु सुगन्धित।
स्वस्थ समाज रहे हरओर।
कलयुग की चाभी जो पकड़ी।
खुलेंगे कालमुख चारोओर।
रोहित "सादिक़ "
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