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Tuesday, 12 January 2021

हमे ख़ाश-ओ-आम न समझा जाये।

 हमे ख़ाश-ओ-आम न समझा जाये। 

किसी का मान या अरमान न समझा जाये। 

हमे भी जिंदगी जीने दो खुलकर। 

मेरे करीबियों !

हमे बस मतलब का सामान न समझा जाये। 


तुम हमदर्द, हमराह हो तो फिर साथ आओ। 

सफर का दर्द और कुछ चोट खाओ। 

हमने सींचा पसीने से जिस बाग़ को। 

उसके फूलों को गजरे का सामान न समझा जाये। 


तुम्हारे लिए कुछ कर दे तो अहसान न समझा जाये। 

जो कुछ कह दे तो अपमान न समझा जाये। 

हम सीढ़ी बने की तुम छू लो ऊचाइयों को। 

हमे ही अर्थी का सामान न समझा जाये। 


हमें न ख़ास ! न आम ! न जरूरी सामान ! समझा जाये। .. 



रोहित

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