तू लड़की है, तेरा यही हुनर काफी है।
मेरी एक गलती में फांसी, तेरा सात खून माफ़ी है।
रोहित
तू लड़की है, तेरा यही हुनर काफी है।
मेरी एक गलती में फांसी, तेरा सात खून माफ़ी है।
रोहित
जिंदगी ! ये क्या कंजूसी ...
यू ही जिए जा रहे हैं।
जो पाया, सो खाया,
नहीं तो पिए जा हैं।
जिंदगी ! ये क्या मजाक है ...
खुशियाँ बे मोल हैं।
न जाने क्या कमाने की होड़ है।
क्यू सोचू, के क्या जोडू, क्या छोड़ू।
क्या बेजा और क्या बेजोड़ है।
जिंदगी ! ये क्या गज़ब है ...
समझा, न कुछ
सब कुछ अजब है।
वही लोग, वही कल, वही आज है।
कुछ भी तो नहीं बदला मुझमे।
वही मै, और वही काम-काज है।
जिंदगी...
रोहित
हमे ख़ाश-ओ-आम न समझा जाये।
किसी का मान या अरमान न समझा जाये।
हमे भी जिंदगी जीने दो खुलकर।
मेरे करीबियों !
हमे बस मतलब का सामान न समझा जाये।
तुम हमदर्द, हमराह हो तो फिर साथ आओ।
सफर का दर्द और कुछ चोट खाओ।
हमने सींचा पसीने से जिस बाग़ को।
उसके फूलों को गजरे का सामान न समझा जाये।
तुम्हारे लिए कुछ कर दे तो अहसान न समझा जाये।
जो कुछ कह दे तो अपमान न समझा जाये।
हम सीढ़ी बने की तुम छू लो ऊचाइयों को।
हमे ही अर्थी का सामान न समझा जाये।
हमें न ख़ास ! न आम ! न जरूरी सामान ! समझा जाये। ..
रोहित