कह दूं हर बात खुल के, जरूरी तो नहीं।
सह लूं जो गलत हो, जरुरी तो नहीं।।
मै डर डर रहने कि आदत डाल लूंगा, कसम से।
पर इतनी जल्दी बदल जाऊ, जरुरी तो नहीं।।
हां से हां मिला लिया तो क्या, कम था।
तुम ही तुम तो थे हरदम, कहां मै था?
जो गलत है तो रहे कैसे, और सच, ना रहे कैसे।
हम कबूल करें फिर भी... मजबूरी तो नहीं।।
कह दूं हर बात खुल के जरूरी तो नहीं...
रोहित "सादिक"