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Saturday, 26 December 2020

मै दूर जाउंगा जरूर

मै दूर जाऊंगा जरूर।
एक बार बुलाऊंगा जरुर।।
हाल ऐसा है मेरे बसर का।
जल्द गुजर जाऊंगा जरूर।।

ज़िन्दगी रही न अब चाह बाकी।
एक जिद के सिवा न राह बाकी।।
वो देखेंगे, मै दिखाउंगा जरूर।
मैं दूर जाउंगा जरूर।।

जी में जो आये करते जाओ।
मार दो या फिर मरते जाओ।।
ये कशमकश साथ है मेरे अभी भी।
अभी और रुलाऊगा जरुर।
मैं दूर जाउंगा जरूर।

Friday, 20 November 2020

अबकी सर्दी

अबकी सर्दी अच्छी है। 
पर जगना पड़ता है।।

मन ना भी हो।
पर लगना पड़ता है।।

साँस रुकने को कहती है। 
पर जीने के लिए कुछ करना पड़ता है।।

अच्छा !

अबकी सर्दी में कुछ खास होगा।
अकेले कब से थे, पर अब एहसास होगा।।

ये बदनसीबी का सिलसिला अच्छा।
लगी आग तो घर जला अच्छा।।

अबकी सर्दी, गद्दा कहीं, और रजाई कहीं और।
दिया कहीं, और दिया सलाई कहीं और।।

जब जीना दुसवार! तो क्या मंदिर क्या मदीना अच्छा। 
ऐसी हो सर्दी तो। 
फिर चिल-चिलाता पसीना अच्छा है।

रोहित "सादिक"

Thursday, 15 October 2020

मेरी ख़ुशी के मायने अलग हैं...

 मेरी ख़ुशी के मायने अलग हैं। 

तेरी ख़ुशी के मायने अलग हैं।। 


ज़िंदगी कैसे दिखे एक सी हमको। 

हमारे आईने अलग अलग  हैं।। 


Rohit Sadik

Friday, 7 August 2020

जब तक तुझे होश रहेगा...

जब तक तुझे होश रहेगा।
ये तो तय है, अफ़सोस रहेगा।।

तूझे जिद है तो है ऊंचा उड़ने की।
आशिया - ए - शुकूं ज़मीदोज़ रहेगा।।

Rohit Sadik


Thursday, 23 July 2020

जवाबदारी किसकी है?

जवाबदारी  किसकी है?
जवाबदारी  किसकी है?

गर हम ऐसे हैं तो।
ये जिम्मेदारी किसकी है?

जवाबदारी  किसकी है?

कौन आये, उठाये, बोझ जिंदगी का?
समझ नहीं आता के अबकी बारी किसकी है?

ये जिम्मेदारी किसकी है?
जवाबदारी  किसकी है?


रोहित सादिक

Saturday, 20 June 2020

आखरी सितम

मुझे छोटे में नहीं कुछ बड़े में रहना है।
मार देना अगर तो एक एहसान भी कर देना।।
कहीं यमुना में नहीं मुझे समन्दर में बहना है।

सायद ये आखिरी हो गुनाह मेरा।
मै बेगुनाह हूं बस यही गुनाह मेरा।।

मै साबित ना कर पाऊंगा, मासूम होके भी बच ना पाऊंगा।
मेरे गुनाहों के नाम न गिना पाएंगे गिनाने वाले।
फिर भी बचा न पाएंगे मुझे बचाने वाले।।

तुम्हे अफसोस तो होगा पर कह न पाओगे किसी से।
मेरी बात करने का मन तो होगा पर कर न पाओगे किसी।

तुम्हारे हाथ खाली होंगे मुझे लूट लेने के बाद।
रो रो के रहोगी मेरे जाने के बाद।

रोहित सादिक

Tuesday, 5 May 2020

कितने अकेले हैं...

कितने अकेले हैं।
जब भी देखते हैं।
पूछते रहते हैं।
खुद से।

बिन बात की बात।
बस बात ही बात।
जब भी करते हैं।
खुद से।

दूर दूर घूमते हैं।
औरो में खुशी ढूड़ते है।

सोचते हैं कि बदल दे।
रस्ता नया चुन ले।
मिले तो कभी।
खुद से।

"रोहित सादिक"

बे-नवा सा बसर मेरा...

बे-नवा सा बसर मेरा। 
कार-ए-सबाब कर दे।।

रोज-ए-हिसाब का इन्तज़ार न कर। 
सर-ए-इताब आ, मुकम्मल बाब कर दे।।

"रोहित सादिक"

Thursday, 30 April 2020

थोड़ा बदचलन होना चाहिए !

जिंदगी गुजारने के लिये चाल चलन होना जरुरी है !
लज्जत बनी रहे।
इसलिए थोड़ा बदचलन होना जरुरी है।।

रोहित सादिक

Thursday, 23 April 2020

तेरी खुली जुल्फों को सवारू

तेरी खुली जुल्फों को सवारू।
तू कह के तो देख।
फूल क़दमों में बिछा दू।
तू कह के तो देख।
 मै ख़ुद तेरा साथ चाहता हूं, कसम से।
फना तुझपे हो जाऊ।
तू कह के तो देख।

रोहित सादिक

Tuesday, 14 April 2020

जिंदगी...

क्या करें यहां झमेले बहुत हैं।
डरते हैं क्यूकी अकेले बहुत हैं।।

मेरे हमसफ़र! हमदम! मेरे हमराह!
मुझे सहारा दिए रहना।।

ये जिदंगी का दरिया है।
यहां थपेड़े बहुत हैं।।

क्या करें यहां झमेल बहुत हैं।

रोहित "सादिक"

Tuesday, 7 April 2020

Lockdown

समझ में कुछ क्यूं नही आता।
मैं मजबूर हूं तो तू ही क्यूं नही आता।।

मेरे रब, मेरे मौला, मेरे परवरदिगार।
हम तेरे ही तो बंदे हैं।।

जानें दे पास मुझे, मेरे चहीतो के।
नहीं तो देर क्यूं, क्यूं अपने ही पास नहीं बुलाता।।

समझ में कुछ क्यूं नही आता...

रोहित सादिक

Tuesday, 17 March 2020

आज का सच

शेर सब चूहे और
कुत्ते शिकारी

नेता सब दानी
और जनता भिखारी

रोहित सादिक

Saturday, 29 February 2020

मैं इसका उसका सबका होने में रह गया...

मैं इसका उसका सबका होने में रह गया।
ऐ जिंदगी तुझे समझने में रह गया।

अब तो सबो-रोज कट रहे इसी कशमकश में।
के क्या रहा बाकी मुझमें और क्या गुज़र गया।।

ऐ जिंदगी तुझे समझने में रह गया...

मेरी हस्ती जो कुछ थी भी क्या?
मैं कुछ हूं अभी भी क्या?

न जाने ये चाव कब हुआ।
मैं कौड़ियों के भाव कब हुआ।

अंधेरों की आदत नहीं थी मुझको।
मैं दिये जलाने में रह गया।।

मैं सबका होने में रह गया
मैं सबका होने में रह गया....

रोहित सादिक




Friday, 28 February 2020

काफ़िर कौन?

काफ़िर लफ्ज सुनते ही हमारे मन में कुछ अलग सी तस्वीर उभर आती है। ये कैसी तस्वीर है। क्या हमे यह पता चल पाया की जो तस्वीर हम अपने अंदर देख रहे हैं, वास्तव में वही काफ़िर है। या ये हमारे मन का भ्रम है या समझ की कमजोरी। या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे मन में ये तस्वीर कोई बना रहा है। आपको यह तो समझना ही पड़ेगा कि मन में तस्वीर बनाना कागज़ में कोई आयत बनाने से भी ज्यादा सहज है। इसके लिए न कोई कागज़ ना कोई कलम ना कोई जरूरत यह सोचने की, कि यह तस्वीर दिखेगी कैसी। और इस बात का भी कोई डर नहीं की इसका क्या होगा अगर यह अच्छी न हुई। बस कुछ जबानी आतिशाज़ी और एक साथ कई तस्वीरों ने अपनी शक्ल ले लीं।

"काफ़िर"

यह एक मुकम्मल जुमला!
"देवबन्दी के नज़दीक बरेलवी काफ़िर है, बरेलवी के नजदीक देवबंदी। दोनो के नज़दीक अहले हदीस काफ़िर है। तीनो के नजदीक सिया काफ़िर हैं, और चारो के नजदीक अहमदिया"
अब तो यह और भी मुश्किल हो जाता है कि हम क्या फैसला ले। अपने अंदर की वह तस्वीर जो किसी गेरूए कपड़े से ढकी किसी हमदर्द सी लगती है उसे मिटाएं या हमदर्द को?
फ़ैसला आप पर है! कि काफ़िर कौन?
सायद तस्वीर।

रोहित सादिक


Saturday, 8 February 2020

कितने बेग़ैरत, कितने बेकार हुए...

कितने बेग़ैरत, कितने बेकार हुए।
देख ! हम तेरे भी गुनहगार हुए।।

तब न आये, जब काम आना था।
अब क्या जो हम कामगार हुए।।

देख ! हम तेरे भी गुनहगार हुए।।

रोहित सादिक

Friday, 7 February 2020

हवा बदल रही है...

हवा बदल रही है।
तुम्हे तेवर भी बदले नजर आएंगे।।

हम साथ हैं उसके अभी भी।
और साथ ही नजर आएंगे।।

तुम चाहो तो बदल लो रास्ते अपने।
छोड़ दो ताल्लुक और बदल लो वास्ते अपने।।

हम सूरज की तरह चमकेंगे फिर भी।
और
तुम्हे रात में क्या दिन में तारे नजर आएंगे।।

रोहित सादिक

Thursday, 6 February 2020

मुझे खबर है...

मुझे खबर है।
मैं वाकिफ हूँ सबसे।
ये जो गुफ़्तगू है तेरी।
ये सब बाजारू जुमले हैं।
न जाने कब से।

तेरी तिलमिलाहट बयां करती है।
दहशत भीतर की।
तू ऐसी ही थी।
तू ऐसी ही है।
न जाने कब से।

मुझे खबर है।
मैं वाकिफ हूँ सबसे।

रोहित सादिक़

Thursday, 30 January 2020

हाल-ए-हकीकत की दस्ता अलग है...

हाल-ए-हकीकत की दस्ता अलग है। 
क्या कहूँ अब, तेरा मिजाज ही अलग है।। 

मेरा सवाल आज भी वही है।
क्या गलती की, और क्या गलत है।।


रोहित सादिक

उन्हें फ़ुर्सत कहाँ राब्ता होने को...

उन्हें फ़ुर्सत कहाँ राब्ता होने को।
हमें कोई और कहाँ वाबस्ता होने को।।

न वो मेरे, न हम खुद के। 
फिर क्या कुछ, कहाँ है खोने को।

रोहित "सादिक़"

न जाने कब मेरा जोर आजमाया जायेगा...

न जाने कब मेरा जोर आजमाया जायेगा।
उस कयामत से कब पर्दा उठाया जायेगा।।

जले तो रोज दिये उनकी यादों के।
न जाने कब इनको बुझाया जायेगा।।

ये सोच के ही बसर है अपना।
मौसम का भी असर है अपना।।

मदहोश होने तक, कब हमको पिलाया जायेगा।
फिर आखिर कब हमको संभाला जायेगा।।

तारों के साथ गुजरेगी हमारी कब तक।
कब चाँद मेरे घर उतरा जायेगा।।

न जाने कब मेरा जोर आजमाया जायेगा।
उस कयामत से कब पर्दा उठाया जायेगा ...

रोहित सादिक










Tuesday, 7 January 2020

जरूर और चाहत...

"बस पाले भर का फर्क है जरूरत और चाहत में, जरूरत प्यास बुझा देती है और चाहत प्यास जगा देती है।"

रोहित सादिक

समय बड़ा वक्ता है...

"समय बड़ा वक्ता है, बड़ी से बड़ी बात कम से कम शब्दों में बता देता है, इसलिए जिन्दगी का मतलब समय पर छोड़ दो, वो जितना बताए बस उतना करते जाओ।"

रोहित सादिक

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