न कुछ कहा न सुना उसने।
लाखो में एक मुझे चुना जिसने।
ये किसकी नजर लगी रब जाने।
बीच रास्ते मे छोड़ा मुझे।
कसमे खाई थी सात जन्मों कि जिसने।
किसपे ऐतबार करू, इतराऊ किसपे।
एक जान वो भी छोटी सी।
किसे किसे चाहूँ, लूट जाऊं किस पे।
उस सितमगर की भेंट चड़ के भी तो सुकूँ नही आया।
मारा छुरी भी उसी ने।
जान कहके कभी बुलाया था जिसने।
न कुछ कहा न सुना उसने।
रोहित "सादिक़"
No comments:
Post a Comment