न कोई हमदर्दी न दिलाशा।
ये कैसा है रिस्ता ये कैसी है आशा।
हमें किस तरह से है जुस्तज़ू तुम्हारी।
तुम मिले न कहीं हमने हर जगह तलाशा।
हर रोज खटखटाते रहे तेरी चौखट।
फिर भी न खुला तेरा दरो-दरवाज़ा।
न कोई हमदर्दी न दिलाशा।
ये कैसा है रिस्ता ये कैसी है आशा।
रोहित "सादिक़"
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