जाओ, तुम सऽऽब दूर जाओ।।
ये मेरी लाश, और आऽऽग मेरी।
तुम घी डालो, और मुझे जलने दो।।
रोहित सादिक
हमे ख़ाश-ओ-आम न समझा जाये।
किसी का मान या अरमान न समझा जाये।
हमे भी जिंदगी जीने दो खुलकर।
मेरे करीबियों !
हमे बस मतलब का सामान न समझा जाये।
तुम हमदर्द, हमराह हो तो फिर साथ आओ।
सफर का दर्द और कुछ चोट खाओ।
हमने सींचा पसीने से जिस बाग़ को।
उसके फूलों को गजरे का सामान न समझा जाये।
तुम्हारे लिए कुछ कर दे तो अहसान न समझा जाये।
जो कुछ कह दे तो अपमान न समझा जाये।
हम सीढ़ी बने की तुम छू लो ऊचाइयों को।
हमे ही अर्थी का सामान न समझा जाये।
हमें न ख़ास ! न आम ! न जरूरी सामान ! समझा जाये। ..
रोहित
मेरी ख़ुशी के मायने अलग हैं।
तेरी ख़ुशी के मायने अलग हैं।।
ज़िंदगी कैसे दिखे एक सी हमको।
हमारे आईने अलग अलग हैं।।