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Friday, 1 December 2017

MY WORDS FOREVER

तुम....

कभी फागुन का फाग....

कभी सावन का साज....

कभी भादव का राग....

तुम....

 

तुम....

जैसे झरने का ढंग....

जैसे तितली का रंग....

जैसे सतरंगी दानुष कोई....

जैसे मतवाली लहर  कोई....

तुम....

 

तुम....

सारी में नार लगो....

सरसो का फूल लगो....

मन मोहक रूप लगो....

तुम....

 

तुम....

एक जलती अगन जैसे....

मन की लगन जैसे....

मोहन की बासुरी सी....

तान कोई अनसुनी सी....

तुम....

 

तुम....

एक मुमताज़ नगीना हो....

मेरे मंदिर, मस्जिद, मेरा  मदीना हो....

तुम होली हो, दिवाली हो, तुम ही रमजान हो....

गीता, रामायन तुम ही कुरान हो....

तुम....

 

तुम....

एक मीठी सी चाह मेरी....

झिलमिल सी राह मेरी....

सपनो के ताज़ जैसी....

किसलय की कली कोई....

तुम....

 

तुम रखो कदम जहाँ....

वो घर आबाद हो जाये....

रहे क़ायम क़यामत तलक बादशाहत तेरी....

फेर दे जो एक नज़र "सादिक़" ग़ुलाम  जाये।

रोहित "सादिक़ "

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