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Tuesday, 12 June 2018

उनके हुजरे में गये की रूसवाई मिटा लें।

उनके हुजरे में गये कि रुसवाई मिटा लें।
दो घूट लें और सारी तनहाई मिटा लें।
वो एड़ियां रगड़ रहीं हैं कि बस, कोई हीरा उन्हें मिल जाये।
ये नहीं कि, ये, कोहिनूर गले लगा लें।

रोहित "सादिक़"

Friday, 1 June 2018

My words forever

बात ये है की लोग हमारी महफ़िलो को तरसें।
और वो है की हम पे ही बरसें।

Rohit "Sadik"

Saturday, 12 May 2018

My words forever

जो व्यक्ति, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होगा वह समाज कल्याण की बात नहीं कर सक्ता।
इसलिए समाज को भी उसकी उतनी ही परवाह करनी चाहिए, जितनी प्रकाश के लिए जलते दीपक से निकलने वाले धुएँ की परवाह की जाती है।

The person who will be motivated by personal self-interest, does not talk about social welfare.
Therefore, society should also care for it's equally, as much as the smoke that is emitted from the burning lamp for the light is cared for.

रोहित "सादिक़ "

Friday, 27 April 2018

अब प्यार करने को मैं न रह पाउँगा...

अब प्यार करने को मैं न रह पाउँगा...
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मेरे जाने का गम, न आने की ख़ुशी होगी।
मेरे बाद, न जिंदगी होगी।
तू आस्तीन में रखती है, न जाने क्या क्या।
मैं यूं मुकर जाऊंगा, सोचती होगी।

मैं कुछ कहूँ भी न, चुप रहूँ भी न।
पास पास मगर साथ रहूँ भी न।
तू खुद से पूछ के तेरी आँखों में अब भी पानी है?
मैं कैसे कहूँ के सांस लूँ मगर जी पाऊँ भी न।

मेरे मजबूर क़दम अब ठहर से गए।
तुझे देख यूँ, ये सहम से गए।
मैं देखूँ कभी उसे, कभी तुझे।
चोट लगी और हम दहल गए।

तेरा मिजाज तुझे मुबारक हो।
ये साज बाज तुझे मुबारक हो।
मैं ख़ुश हूँ की, तू खुश हो।
और गम है, की खुश क्यूँ हो।

तेरी चाल मैं न चल पाउँगा।
मामला दिल का है खुल के न कह पाउँगा।
तुझे अब जरुरत है, की संभल जाये।
माफ़ करने को हर बार मैं न रह पाउँगा।
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अब प्यार करने को मैं न रह पाउँगा।।

रोहित "सादिक़"

Saturday, 21 April 2018

तू दरिया ए इश्क़...

तू दरिया ए इश्क़
उतर जाउ कैसे
बिना ड़ूबे बिना
बच पाऊँ कैसे
दवा, दुआ न काम आई
शराब मरहम सी, जरा आराम लाई
मै बुतों की नुमाइंदगी कुरू
किस किस की क्यूँ बंदगी करू
तू दरिया ए इश्क़
मेरी नुमाइश दर ब दर
बस एक ख्वाहिश इस क़दर
तेरा रंग लूँ
तेरा राग लूँ
तू रुक यहाँ
मैं तराश लूँ
तू दरिया के इश्क़
शतर पाउ कैसे
मासूदगी(संतोष) तेरी फिर
मुस्तआर(उधारी) क्यूँ
मक़सूद तू, तो
मिजाज क्यूँ
तू दरिया ए इश्क़
रोहित सादिक़

Thursday, 5 April 2018

तेरी आदत सुधर जाये तो ग़नीमत है...

तेरी आदत सुधर जाये तो ग़नीमत है।
मेरी बात समझ आये तो ग़नीमत है।
जो रंग चढ़ा है तुझपे, वो सजा, न किसी पे।
तेरा भी जल्द उतर जाये तो ग़नीमत है।

रोहित सादिक़

My words forever

मैं फ़िजूल की कवायत में वक़्त जाया नहीं करता।
हाँथी की सवारी करता हूँ, कुत्तों के भौकने में आया नही करता।

रोहित सादिक़

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