न कुछ कहने को है।
न सुनने को रहा बाकी।
बिन तुम्हारे कैसे बिताए दिन।
और कैसे रात काटी।
ये इश्क़ का बीमार बच गया फिर भी।
बदन जरजर ...
पर अब तलक है सांस बाकी।
रोहित "सादिक"
न कुछ कहने को है।
न सुनने को रहा बाकी।
बिन तुम्हारे कैसे बिताए दिन।
और कैसे रात काटी।
ये इश्क़ का बीमार बच गया फिर भी।
बदन जरजर ...
पर अब तलक है सांस बाकी।
रोहित "सादिक"
फ़क़त निज़ाम के माफ़िक चलूंगा।
मैं अपने ईमान के माफ़िक चलूंगा।
मुझे रास्ता दिखा देगा ख़ुदा खुद ही।
जो मैं इन्सान के माफ़िक चलूंगा।
"रोहित सादिक़"
संस्कार अनुवांशिक नहीं होते। और इसके लिए माता, पिता के साथ समाज भी जिम्मेदार होता है।
रोहित "सादिक़"