उन्हें फ़ुर्सत कहाँ राब्ता होने को।
हमें कोई और कहाँ वाबस्ता होने को।।
न वो मेरे, न हम खुद के।
फिर क्या कुछ, कहाँ है खोने को।
रोहित "सादिक़"
कह दूं हर बात खुल के, जरूरी तो नहीं।
सह लूं जो गलत हो, जरुरी तो नहीं।।
मै डर डर रहने कि आदत डाल लूंगा, कसम से।
पर इतनी जल्दी बदल जाऊ, जरुरी तो नहीं।।
हां से हां मिला लिया तो क्या, कम था।
तुम ही तुम तो थे हरदम, कहां मै था?
जो गलत है तो रहे कैसे, और सच, ना रहे कैसे।
हम कबूल करें फिर भी... मजबूरी तो नहीं।।
कह दूं हर बात खुल के जरूरी तो नहीं...
रोहित "सादिक"
न कुछ कहने को है।
न सुनने को रहा बाकी।
बिन तुम्हारे कैसे बिताए दिन।
और कैसे रात काटी।
ये इश्क़ का बीमार बच गया फिर भी।
बदन जरजर ...
पर अब तलक है सांस बाकी।
रोहित "सादिक"