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Saturday, 29 February 2020

मैं इसका उसका सबका होने में रह गया...

मैं इसका उसका सबका होने में रह गया।
ऐ जिंदगी तुझे समझने में रह गया।

अब तो सबो-रोज कट रहे इसी कशमकश में।
के क्या रहा बाकी मुझमें और क्या गुज़र गया।।

ऐ जिंदगी तुझे समझने में रह गया...

मेरी हस्ती जो कुछ थी भी क्या?
मैं कुछ हूं अभी भी क्या?

न जाने ये चाव कब हुआ।
मैं कौड़ियों के भाव कब हुआ।

अंधेरों की आदत नहीं थी मुझको।
मैं दिये जलाने में रह गया।।

मैं सबका होने में रह गया
मैं सबका होने में रह गया....

रोहित सादिक




Friday, 28 February 2020

काफ़िर कौन?

काफ़िर लफ्ज सुनते ही हमारे मन में कुछ अलग सी तस्वीर उभर आती है। ये कैसी तस्वीर है। क्या हमे यह पता चल पाया की जो तस्वीर हम अपने अंदर देख रहे हैं, वास्तव में वही काफ़िर है। या ये हमारे मन का भ्रम है या समझ की कमजोरी। या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे मन में ये तस्वीर कोई बना रहा है। आपको यह तो समझना ही पड़ेगा कि मन में तस्वीर बनाना कागज़ में कोई आयत बनाने से भी ज्यादा सहज है। इसके लिए न कोई कागज़ ना कोई कलम ना कोई जरूरत यह सोचने की, कि यह तस्वीर दिखेगी कैसी। और इस बात का भी कोई डर नहीं की इसका क्या होगा अगर यह अच्छी न हुई। बस कुछ जबानी आतिशाज़ी और एक साथ कई तस्वीरों ने अपनी शक्ल ले लीं।

"काफ़िर"

यह एक मुकम्मल जुमला!
"देवबन्दी के नज़दीक बरेलवी काफ़िर है, बरेलवी के नजदीक देवबंदी। दोनो के नज़दीक अहले हदीस काफ़िर है। तीनो के नजदीक सिया काफ़िर हैं, और चारो के नजदीक अहमदिया"
अब तो यह और भी मुश्किल हो जाता है कि हम क्या फैसला ले। अपने अंदर की वह तस्वीर जो किसी गेरूए कपड़े से ढकी किसी हमदर्द सी लगती है उसे मिटाएं या हमदर्द को?
फ़ैसला आप पर है! कि काफ़िर कौन?
सायद तस्वीर।

रोहित सादिक


Saturday, 8 February 2020

कितने बेग़ैरत, कितने बेकार हुए...

कितने बेग़ैरत, कितने बेकार हुए।
देख ! हम तेरे भी गुनहगार हुए।।

तब न आये, जब काम आना था।
अब क्या जो हम कामगार हुए।।

देख ! हम तेरे भी गुनहगार हुए।।

रोहित सादिक

Friday, 7 February 2020

हवा बदल रही है...

हवा बदल रही है।
तुम्हे तेवर भी बदले नजर आएंगे।।

हम साथ हैं उसके अभी भी।
और साथ ही नजर आएंगे।।

तुम चाहो तो बदल लो रास्ते अपने।
छोड़ दो ताल्लुक और बदल लो वास्ते अपने।।

हम सूरज की तरह चमकेंगे फिर भी।
और
तुम्हे रात में क्या दिन में तारे नजर आएंगे।।

रोहित सादिक

Thursday, 6 February 2020

मुझे खबर है...

मुझे खबर है।
मैं वाकिफ हूँ सबसे।
ये जो गुफ़्तगू है तेरी।
ये सब बाजारू जुमले हैं।
न जाने कब से।

तेरी तिलमिलाहट बयां करती है।
दहशत भीतर की।
तू ऐसी ही थी।
तू ऐसी ही है।
न जाने कब से।

मुझे खबर है।
मैं वाकिफ हूँ सबसे।

रोहित सादिक़

Thursday, 30 January 2020

हाल-ए-हकीकत की दस्ता अलग है...

हाल-ए-हकीकत की दस्ता अलग है। 
क्या कहूँ अब, तेरा मिजाज ही अलग है।। 

मेरा सवाल आज भी वही है।
क्या गलती की, और क्या गलत है।।


रोहित सादिक

उन्हें फ़ुर्सत कहाँ राब्ता होने को...

उन्हें फ़ुर्सत कहाँ राब्ता होने को।
हमें कोई और कहाँ वाबस्ता होने को।।

न वो मेरे, न हम खुद के। 
फिर क्या कुछ, कहाँ है खोने को।

रोहित "सादिक़"

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