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Friday, 28 February 2020

काफ़िर कौन?

काफ़िर लफ्ज सुनते ही हमारे मन में कुछ अलग सी तस्वीर उभर आती है। ये कैसी तस्वीर है। क्या हमे यह पता चल पाया की जो तस्वीर हम अपने अंदर देख रहे हैं, वास्तव में वही काफ़िर है। या ये हमारे मन का भ्रम है या समझ की कमजोरी। या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे मन में ये तस्वीर कोई बना रहा है। आपको यह तो समझना ही पड़ेगा कि मन में तस्वीर बनाना कागज़ में कोई आयत बनाने से भी ज्यादा सहज है। इसके लिए न कोई कागज़ ना कोई कलम ना कोई जरूरत यह सोचने की, कि यह तस्वीर दिखेगी कैसी। और इस बात का भी कोई डर नहीं की इसका क्या होगा अगर यह अच्छी न हुई। बस कुछ जबानी आतिशाज़ी और एक साथ कई तस्वीरों ने अपनी शक्ल ले लीं।

"काफ़िर"

यह एक मुकम्मल जुमला!
"देवबन्दी के नज़दीक बरेलवी काफ़िर है, बरेलवी के नजदीक देवबंदी। दोनो के नज़दीक अहले हदीस काफ़िर है। तीनो के नजदीक सिया काफ़िर हैं, और चारो के नजदीक अहमदिया"
अब तो यह और भी मुश्किल हो जाता है कि हम क्या फैसला ले। अपने अंदर की वह तस्वीर जो किसी गेरूए कपड़े से ढकी किसी हमदर्द सी लगती है उसे मिटाएं या हमदर्द को?
फ़ैसला आप पर है! कि काफ़िर कौन?
सायद तस्वीर।

रोहित सादिक


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