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Friday, 16 February 2018

MY WORDS ROREVER

न कोई हमदर्दी न दिलाशा। 
ये कैसा है रिस्ता ये कैसी है आशा। 

हमें किस तरह से है जुस्तज़ू तुम्हारी। 
तुम  मिले न कहीं हमने हर जगह तलाशा। 

हर रोज खटखटाते रहे तेरी चौखट। 
फिर भी न खुला तेरा दरो-दरवाज़ा। 

न कोई हमदर्दी न दिलाशा। 
ये कैसा है रिस्ता ये कैसी है आशा। 

रोहित "सादिक़"

MY WORDS FOREVER

तुझे अपनी गलती का एहसास होगा। 
भरोसा है तुझे भी प्यार होगा। 

एड़िया रगड़ रहा हूँ जो तेरे दरो-दीवार के। 
यकीं है तुझे भी इंतजार होगा। 

ये गुलिस्ताँ-ए-हुस्न कब मुकम्मल साथ देता है।
ख़बर रख, काटों से काम होगा। 

तुझे अपनी गलती का एहसास होगा।

रोहित "सादिक़ "

MY WORDS FOREVER


वो मर गया,
वहम ज़िंदा है अब भी। 

रीता मैं। 
मन परिंदा है अब भी। 

कोशिश-ए-नाकाम की, कि जला दूँ उसे। 
दिल -ए -दरबार में एक पुलिंदा है अब भी। 

रोहित "सादिक"

Wednesday, 3 January 2018

बाल कविता

चित्र विचित्र बना घनघोर।
चले है बढ़ते तम की ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

बादल बदले।
नदियाँ बदली।
थल-नभ बदले चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

उजड़े वन, उपवन सब उजड़े।
कूप तड़ाग सरोवर छिछले।

कमतर पगडण्डी सब उजड़ी।
और गाँव की गालियाँ उजड़ीं।
खपरैले की चौपालें भी।
घासों की झोपड़ियाँ उजड़ीं।

तिनके बिखरे चारो ओर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

चमकीली तितली की लड़ियाँ।
मोर चकोर सुहावन चिड़ियाँ।
अब न रहीं बौरें रसबोर।
कलयुग की चाभी है पकड़ी।
खुले काल मुख चारो ओर।

कौतूहल हो रहा प्रकृति में।
असमंजस में दुनियाँ सारी।
कर दोहन धरनी का निसदिन।
सींच रहे अपनी फुलवारी।


कर विकाश, विनाश का प्रतिदिन।
हो प्रसन्न गुणगान कर रहे।
कोप प्रकृति बरसाये जिसदिन।
मिलकर सब क्यूँ विलाप कर रहे।

आओ हम सब फूल खिलाये।
धरनी का श्रृंगार सजायें।
वापस लें आये नदियों को।
जहाँ विहग सब सोर मचाये।

स्वस्थ धरा हो वायु सुगन्धित।
स्वस्थ समाज रहे हरओर।

कलयुग की चाभी जो पकड़ी।
खुलेंगे कालमुख चारोओर।

रोहित "सादिक़ "

Sunday, 31 December 2017

HAPPY NEW YEAR

नव वर्ष, नव सुबह मिली लो, नवल गीत का गान कर लो।
नवल ऊर्जा, नव तरंग है, तुम नया निर्माण कर लो।

प्रीत जीवन मे उतारो, मीत संग रस पान कर लो।
नवल ऊर्जा, नव तरंग है, तुम नया निर्माण कर लो।

तार, हर दिन के बुन लो।
शाम, सुब कि नीति चुन लो।
कर ब्रहत ध्वज, साथ चलना।
रह न जाये कोई तम में।
सब, सभी का हाथ धर लो।

नवल ऊर्जा, नव तरंग है, तुम नया निर्माण कर लो।

नव वर्ष की शुभकामनाएं।
जय हिंद।
रोहित "सादिक़"

Tuesday, 5 December 2017

MY WORDS FOREVER

मैं मुआयने की चीज नहीं।।
फिर नुमाइश में क्यूँ लाये।।
जब होना उसी का है।
तो कोई ख्वाहिश में भी क्यूँ आये।

और
मुझे परख के भी होगा न कुछ हासिल साकी।
मेरी बस्ती लूट चुकी, रहा न कुछ बाकी।
ईमान मेरा और मैं ही हूँ  खजाने में।
"सादिक़" भला क्यूँ साथ माँगे।।

रोहित "सादिक़"

Friday, 1 December 2017

MY WORDS FOREVER

तुम....

कभी फागुन का फाग....

कभी सावन का साज....

कभी भादव का राग....

तुम....

 

तुम....

जैसे झरने का ढंग....

जैसे तितली का रंग....

जैसे सतरंगी दानुष कोई....

जैसे मतवाली लहर  कोई....

तुम....

 

तुम....

सारी में नार लगो....

सरसो का फूल लगो....

मन मोहक रूप लगो....

तुम....

 

तुम....

एक जलती अगन जैसे....

मन की लगन जैसे....

मोहन की बासुरी सी....

तान कोई अनसुनी सी....

तुम....

 

तुम....

एक मुमताज़ नगीना हो....

मेरे मंदिर, मस्जिद, मेरा  मदीना हो....

तुम होली हो, दिवाली हो, तुम ही रमजान हो....

गीता, रामायन तुम ही कुरान हो....

तुम....

 

तुम....

एक मीठी सी चाह मेरी....

झिलमिल सी राह मेरी....

सपनो के ताज़ जैसी....

किसलय की कली कोई....

तुम....

 

तुम रखो कदम जहाँ....

वो घर आबाद हो जाये....

रहे क़ायम क़यामत तलक बादशाहत तेरी....

फेर दे जो एक नज़र "सादिक़" ग़ुलाम  जाये।

रोहित "सादिक़ "

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