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Thursday, 26 October 2017

MY WORDS FOREVER

ये तो अच्छा है कि मैं ख़ुद को सहेज लेता हूँ।
छोटी हो चादर तो पैरों को समेट लेता हूँ।
मुमकिन है कि उसे हासिल कर लूँ।
गर खट्टे हो अँगूर तो डाली पर ही छोड़ देता हूँ।

रोहित "सादिक़"

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