ये तो अच्छा है कि मैं ख़ुद को सहेज लेता हूँ। छोटी हो चादर तो पैरों को समेट लेता हूँ। मुमकिन है कि उसे हासिल कर लूँ। गर खट्टे हो अँगूर तो डाली पर ही छोड़ देता हूँ।
रोहित "सादिक़"
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