धुआँ उठा है, कही आग तो लगी होगी।
दिल दुःखा है बहुत, कोई पीड़ तो मिली होगी।
और
कभी फ़ुरसत मिले तो मेरे अश्क की हक़ीकत को सुनना।
इतना तड़पा हूँ, मेरी आह तो निकली होगी।
मुझमें ये कहा कि नर्मी है।
और
सोच तुझमे कहाँ की गर्मी है।
खुदा ने मोड़ दिया है समन्दर का रूख़ भी साचे में।
तू तो कस्ती है बस फिर किस बात की मर्जी है।
मैं सहज हूँ, या कि तू सुलझी न अब तक।
कहाँ की तू रानी है तेरी हुक़ूमत है कब तक।
न जाने कब किसका चाँद बुलंद हो जाये।
समझ ले हक़ को ग़र न जाना हो अब तक।
मैं इसारा कर दूँ और तू सब जान जाये।
सिर हिला दूँ जरा और तू मान जाये।
ख़ुदा का करम हो कि मैं संभल जाऊ।
डर है कि तेरी न निकले और मेरी जान जाये।
रोहित "सादिक़"
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