लगा तो लू तेरी तस्वीर आईने में मेरे।
तू बोल की तू मुझमें समा पाएगी क्या।
मैं खुद को देखूँगा तेरी आँखों मे।
तू बोल की मेरी आँखों मे खुद को देख पाएगी क्या।।
ये इश्क़, ये इबादत, ये मिन्नतें।
ये इश्क़, ये इबादत, ये मिन्नतें।
ये बड़ी मुश्किल सी कबायत है।
मैं तो रोज़ ही करता हूँ।
मुकर जाऊ कभी तो, कर पायेगी क्या।
और
तेरी तकदीर की तू मालकिन नहीं।
लिखी होगी जो मेरी झोली में।
तो बोल फिर बच पाएगी क्या।
रोहित "सादिक़"
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