अब न रास्ते से तालुक है, न मंज़िल को पाने से।
बिरान हुआ हूँ तेरे इश्क में आ जाने से।।
उल्फत भी तेरी क्या रंग लाई।
के लुट गया हूँ मैं दिल के ख़जाने से।।
बस्तियों में अब वो रंगत नहीं रही।
आ गया हूँ शहर के किनारे में।
तफ्तीश मुकम्मल हो तो फिर वापिश जाऊँ।
अकेला हि निकला हूँ, दिल-ए-मयखाने से।।
रोहित गुप्ता "सादिक़"
nice sadik..
ReplyDeleteThanks dear
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ReplyDelete☺️☺️☺️☺️
Chaa gye guru
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DeleteThanks dear
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