अब मैंने इनायत छोड़ दी। वो फ़िजूल की कबायत छोड़ दी।। मिटा दी तेरी यादों की बस्ती को। खुद टूट के तेरी हर शिनाखत तोड़ दी।।
रोहित "सादिक़"
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