मैं इबादत करता हूँ कि मर जाऊँ।
गुजरा हुआ जमाना हुँ, अब गुजर जाऊँ।।
वो रही न, मैं रहा अब वो।
रेत हूँ मुठ्ठी भर, चाहता हूँ कि बिखर जाऊँ।।
न रहूँ न नजर आऊँ।
टूटे मकानों सा उजड़ जाऊँ।।
परिंदा न रहा, उस घोसले सा।
तिनका हुँ बस, चाहता हूँ कि बिखर जाऊँ।।
रोहित "सादिक़"
Kya khoob likha h guru
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